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सत्ताईश साल बाद फिर राष्ट्रपति शासन की दहलीज पर मध्यप्रदेश


यह बिडम्बना ही है कि मप्र एक दफा फिर 27 साल बादराष्ट्रपति शासन की दहलीज पर है। मप्र के सियासी घटनाक्रम और उसके बाद राज्यपाल लालजी टंडन, मुख्यमंत्री कमलनाथ एवं विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति के बीच टकराव के कारण यह हालत बने हैं। सभी के जेहन में एक ही सवाल है, क्या होगा कमलनाथ सरकार का? बचेगी या जाएगी? भाजपा सरकार बना पाएगी या नहीं? क्या प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू हो सकता है? प्रदेश में घट रहे सियासी घटनाक्रम को लेकर ये सवाल जनता के बीच चर्चा में हैं। लग रहा है कि मप्र में भी भाजपा कर्नाटक का नाटक सफल करने की तैयारी में है।
प्रदेश का सियासी घटनाक्रम हर पल बदलने से पूरे मामले में रोमांच बना हुआ है। भाजपा की मांग पर राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर 16 मार्च को उनके अभिभाषण के तत्काल बाद फ्लोर टेस्ट कराने के निर्देश दिए। इसे मुख्यमंत्री ने जवाबी पत्र लिखकर ठुकरा दिया। राज्यपाल ने फिर पत्र लिख कर निर्देश दे दिए कि 17 मार्च को हरहाल में फ्लोर टेस्ट कर बहुमत साबित करें वर्ना माना जाएगा कि सरकार अल्पमत में आ गई है। इस पर सरकार क्या कदम उठाए, इसे लेकर मंथन चल रहा है। राज्यपाल के पत्र की भाषा से साफ है कि वे प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने का आधार तैयार कर रहे हैं। मुख्यमंत्री को वे अब तक इस संदर्भ में तीन पत्र लिख चुके हैं। सभी भाजपा की मांग पर आधारित हैं। मुख्यमंत्री ने जो मांग राज्यपाल के सामने रखीं, उनका किसी पत्र में उल्लेख नहीं है।
राज्यपाल लालजी टंडन ने मुख्यमंत्री के साथ विधानसभा स्पीकर एनपी प्रजापति को भी पत्र लिखा था लेकिन उसे महत्व नहीं दिया गया। केंद्र सरकार द्वारा जारी एडवायजरी और अन्य राज्यों की विधानसभा का उल्लेख कर कोरोना को आधार बनाकर स्पीकर ने विधानसभा 26 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी। इसी दिन राज्यसभा की तीन सीटों के लिए मतदान होना है। राज्यपाल के नए निर्देश से गंभीर स्थिति पैदा हो गई है। उन्होंने कहा है कि 17 को फ्लोर टेस्ट हो और 26 तक सदन की कार्रवाई ही स्थगित की जा चुकी है। ऐसे में क्या होता है, इस पर सबकी नजर है। हालांकि मुख्यमंत्री इस संदर्भ में राज्यपाल से भी मिले हैं।

कांग्रेस भी सुप्रीमकोर्ट जाने की तैयारी में

सोमवार को फ्लोर टेस्ट न होने पर भाजपा सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। मंगलवार को सुबह 11 बजे दो जजों की बेंच इस पर सुनवाई करने वाली है। इधर राज्यपाल के दूसरे पत्र को लेकर कांग्रेस भी मंगलवार की सुबह सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है। साफ है, लड़ाई दो तरफा है। एक तरफ भाजपा और कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट की शरण में हैं और दूसरी तरफ राज्यपाल के पत्रों से प्रदेश में राष्ट्रपति शासन का आधार तैयार हो रहा है। मुख्यमंत्री इस बात पर अड़े हैं कि जब तक उनके बेंगलुरु में बंधक विधायक वापस नहीं आते तब तक फ्लोर टेस्ट का कोई औचित्य नहीं है। कोरोना के कारण सुप्रीम कोर्ट सवाल उठा सकता है कि आखिर भाजपा को फ्लोर टेस्ट की इतनी जल्दी क्यों है? बेंगलुरु में रुके विधायकों को लेकर भी वह कोई निर्देश दे सकता है या कह सकता है कि पहले हाईकोर्ट जाइए। अर्थात बहुत कुछ कोर्ट के रुख पर टिका है।

धरी रह जाएगी दोनों दलों की सियासत


कांग्रेस के हित का ध्यान रखते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने अपने विशेषाधिकार का उपयोग करते हुए सदन की कार्रवाई 26 मार्च तक स्थगित कर दी है। इसी तर्ज पर भाजपा के हित में राज्यपाल अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर राज्यपाल के आदेश की अवहेलना का हवाला देते हुए प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुशंसा कर सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो दोनों दलों की सियासत धरी रह जाएगी। हालांकि चूंकि दोनों दल सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं, इसलिए राज्यपाल कुछ इंतजार कर सकते हैं लेकिन आज उन्होंने ऐसा नहीं किया। अलबत्ता, भाजपा विधायकों के सामने उन्होंने यह तक कह दिया कि मैंने कोई निर्देश दिया है तो इसका पालन कराना भी मुझे आता है।

एक्सपर्ट की राय भी अलग अलग

प्रदेश के सत्ताईश साल बाद फिर राष्ट्रपति शासन की दहलीज पर मध्यप्रदेशसियासी घटनाक्रम के बीच विशेषज्ञों की राय भी अलग-अलग है। लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य ने कहा है कि राज्यपाल के कहने पर मुख्यमंत्री को सदन में फ्लोर टेस्ट कराना ही पड़ता है। जब राज्यपाल को लगता है कि सरकार अलपमत में आ गई है, तो वह फ्लोर टेस्ट कराने के लिए कह सकते हैं। ऐसे मसलों में सरकार को राज्यपाल की बात माननी चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्यपाल ने फ्लोर टेस्ट के लिए कहा लेकिन उसे नहीं माना गया है, यह परंपरा नहीं है। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ विधानसभा के पूर्व पीएस देवेंद्र वर्मा का कहना है कि राज्यपाल को ऐसे अधिकार नहीं है, जैसे पत्र वे लिख रहे हैं। वे तय नहीं कर सकते कि सरकार अल्पमत में आ गई है और जब तक सरकार अल्पमत में नहीं है तब तक वे फ्लोर टेस्ट का निर्देश नहीं दे सकते। ऐसे में प्रदेश में संवैधानिक संकट की स्थिति बन रही है।

मप्र में कब-कब रहा राष्ट्रपति शासन

  • पहली बार – 29 अप्रैल 1977 से 25 जून 1977 तक
  • दूसरी बार – 18 फरवरी 1980 से 5 जून 1980 तक
  • तीसरी बार – 15 दिसंबर 1992 से 7 दिसंबर 1993 तक

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