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राकेश बेदी बोले 9 माह की प्रिपरेशन रिहर्सल के बाद नाटककार के सामने किया नाटक 'मसाज' का शो तो वह बोले ये मेरा शो नही - हीरोइन के पति से मिला कैरेक्टर

राकेश बेदी बोले 9 माह की प्रिपरेशन रिहर्सल के बाद नाटककार के सामने किया नाटक ‘मसाज’ का शो तो वह बोले ये मेरा शो नही

वरिष्ठ पत्रकार अनिल शर्मा ने आजकिचिट्ठी के लिए लिया लेखक और फिल्म अभिनेता राकेश बेदी का इंटव्यू

भोपाल,
जो दर्शक देखना चाहते हैं वही दिखाया जाता है। डबल मीिनंग जॉक भी वैसा ही है। लेकिन मैं यह मानता हूं कि किसी को भी गंदा जॉक सुनाकर हंसाना बेहद आसान है, लेकिन सहज ह्यूमर के साथ एक मैसेज देते हुए हंसाना बहुत मुश्िकल। मेरे पास भी डबल मीिनंग टाइप जॉक का इस्तेमाल करने का पूरा मौका था, मगर मैंने कभी भी ब्लो द बैल्ट जाकर डिग्िनटी को क्रॉस नहीं किया, औरत को लेकर तो िबल्कुल भी नहीं। यह कहना है बॉलीबुड एक्टर राकेश्ा बेदी का। राजधानी की होटल लेक व्यू में वरिष्ठ पत्रकार अनिल शर्मा ने आज की चिट्ठी के लिये उनसे बात की, तो उन्होंने कहा कि एक दौर के बाद बदलाव आता ही है, मगर बुरी चीजें चली जाती हैं और अच्छी याद रह जाती हैं। आपको याद होगा आज से 20 साल पहले नंगी फिल्में आने लगी थी,जिन्हें लोगों ने उनको नकार दिया,तो वह गायब हो गईं। श्रीमान श्रीमती बहु सफल रहा और उसका सेकंड पार्ट नहीं तो आप जानते ही हैं कि शोले भी फिर कहां बन पाई थी। उन्होंने नाटक मसाज को लेकर बताया कि यह 17 साल से मैं कर रहा हूं और दूसरा कोई इसको आज तक नहीं कर पाया है। क्योंकि इसमें बहुत ज्यादा दुख है, उसमें हास्य के साथ दर्शकों को रोकना मुिश्कल होता है।

घण्टेभर हीरोइन रिसेप्शन पर खड़ा रहा तब मिला दिलरुबा का कैरेक्टर

श्रीमान-श्रीमती के लिए मुझे जब रोल का ऑफर आया तब मुझे राइटर ने कहा कि इसके लिए हैंडपैक्ड हस्बैंड का रोल करना होगा।  हैंडपैक्ड तो वही होता है जो सिर्फ आपकी हां में हां मिलाए, लेकिन उसके एक लेवल ऊपर कैसे जाएगा। अब जब आपको किसी रोल की प्रोफाइल पता चल चुकी है तब एक्टर उस कैरेक्टर के लिए ढूंढता है कि वो रोल हमेशा लोगों को याद रहे। मुझे आज भी याद है जब मैं ‘श्रीमान-श्रीमती’ करने वाला था। उस ही दिन रात को एक बड़ी हेरोइन की शादी थी। अगले दिन से उस शो का पहला शूट था।  जब मैं अपनी पत्नी के साथ उस शादी में गया मेरे हाथ में तोहफा भी था, जब लाइन लगी हुई थी स्टेज पर जाने की।  मैंने हस्बैंड को देखा था जिससे शादी हो रही थी।  मुझे तब समझ आगया था कि मेरा वो कैरेक्टर ‘दिलरुबा’ मिल गया।  मैंने उस पार्टी में अपनी पत्नी से कहा मैं यहीं आधा घंटा खड़ा होकर इसे ऑव्जर्व करूंगा।  मैंने पूरी तरह से उस कैरेक्टर को पोर्ट्रे नहीं किया बल्कि एक हद्द तक ऐसा ही रोल को उस सीरियल में  जोड़कर रखा।

थियेटर से निखरता है अंदर का कलाकार

यंग जनरेशन का थिएटर के साथ एक्टिंग में लगाव पर राकेश बेदी ने कहा कि कभी भी ऐसा नहीं हुआ होगा कि कोई भी फुटबॉलर, सिंगर और या क्रिकेटर हो।  ये सभी अगर 15 दिन अपना काम छोड़कर सीधे परफॉर्म करने के लिए चले जाए तो वे नहीं कर पाएंगे।  जितने भी बड़े संगीतज्ञ कहिए या फिर एक्टर कहिए सभी अपना रियाज नहीं छोड़ते।  एक्टर के साथ भी ऐसा ही होता है कि लगातार वो 15 से 20 दिन एक्टिंग न करे तो उसकी भी एक्टिंग प्रभावित जरूर होगी।  मेरा सभी यंगस्टर्स के लिए यही सुझाव रहेगा कि कभी भी अपनी कला को बनाए रखने के लिए उसको पॉलिश बहुत जरुरी है।  अगर काम नहीं करेंगे तो आपके परफॉर्मेंस में भी उसकी झलक देखने को मिलेगी और उसके लिए थिएटर से बढ़िया जगह और कोई नहीं हो सकती। मैं खुद पिछले 40 साल से भी ज्यादा समय से एक्टिंग कर रहा हूं लेकिन एक भी ऐसा महीना नहीं गया है जब स्टेज पर मैंने परफॉर्म न किया हो चाहे वो कोई भी प्लेटफॉर्म हो।

तिरंगा में खबरीलाल का केरेक्टर दूरदर्शन के एंकर से था प्रभावित

मैं यह मानता हंू कि एक स्िक्रप्ट जो है वह तीन जगह अपडेट होती है, जिसमें पहला लेबल वह है जो एक लेखक बंद कमरे में बैठकर लिखता है, दूसरा लेबल वह है जब वह डायरेक्टर के पास आती है। डायरेक्टर यह तय करता है िक मुझको इस स्िक्रप्ट को कैसे एिग्जट करना है और तीसरा लेबल वह है जब वह स्िक्रप्ट एक्टर के पास पहुंचती है, जहां एक्टर तय करता है कि मुझको उस मौके पर कैसे रिएक्ट करना है..मेरा उरी फिल्म में मुझको जो रोल मिला, उसमें जो स्िक्रप्ट थी, वह वहुत ही सामान्य सी थी, निर्देशक ने सिर्फ यह लिखा था कि जो रोल है उसको एसिडिटी है अब उसको कैसे दिखाया जाना है, जैसे मैने उसमें डकार लेकर उभारा, तिरंगा फिल्म में जो खबरी लाल का रोल था, उसको भी मेने दूरदर्शन के एक एंकर को ओवजरव करके प्रस्तुत किया, रोल को उभारना यह कलाकार के ऊपर रहता है।

रोज पढ़ता हूं गालिब

मैं एक शायर और गायक हो गया, क्योंकि बचपन से ही मेरे पिताजी मुझको गालिब के शेर सुनाते हुए ही डांटा करते थे, बढ़ा हुआ तो उन्हें पढ़ने लगा, आज मैं रोज उन्हें पढ़ता हूं। उन्होंने इस मौके पर गालिब का शेर भी सुनाया-
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिजार होता

Aaj kichitthi

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