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  • November 24, 2020

जनजातीय संग्रहालय में बरेदी लोकनृत्य में दिखी ग्रामीण लोक संस्कृति

भोपाल। मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग द्वारा मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में आयोजित बहुविधि कलानुशासनों की गतिविधियों एकाग्र ‘गमक: रंग मध्यप्रदेश’ श्रृंखला अंतर्गत आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा आज 08 नवम्बर, 2020 को श्री दयाराम, डिंडोरी द्वारा बैगा जनजाति का ‘परघौनी’ एवं ‘करमा’, श्री लक्ष्मी नारायण- हरदा द्वारा ‘काठी’, सुश्री अनसुइया तेलीराम भारती- छिंदवाड़ा द्वारा ‘सैताम’, श्री अर्जुन बाघमारे- बैतूल द्वारा ‘ठाठया’ और श्री मनीष यादव, सागर द्वारा ‘बरेदी’ लोकनृत्य की प्रस्तुति हुई | प्रस्तुति की शुरुआत बैगा जनजाति के ‘परघौनी’ नृत्य से हुई, बैगा आदिवासियों में परघौनी नृत्य विवाह के अवसर पर बारात की अगवानी के समय किया जाता है। इसी अवसर पर लड़के वालों की ओर से ऑगन में हाथी बनाकर नचाया जाता है। उसके बाद निमाड़ अंचल के प्रसिद्घ लोकनृत्य-नाटय ‘काठी’ की प्रस्तुति हुई, पार्वती की तपस्या से संबंधित ‘काठी’ एक मातृपूजा का त्यौहार है। इसमें नर्तकों का श्रृंगार अनूठा होता है गले से लेकर पैरों तक पहना जाने वाला बाना जो लाल चोले का घेरेदार बना होता है। काठी नर्तक कमर में एक खास वाद्य यंत्र ढांक्य बांधते हैं जिसे मासिंग के डण्डे से बजाया जाता है, काठी का प्रारम्भ देव प्रबोधिनी एकादशी से होता है, और विश्राम महाशिवरात्रि को होता है।


सैताम नृत्य- भारिया जनजाति का महिलाओं द्वारा किया जाने वाला परम्परागत नृत्य है। इसमें हाथों में मंजीरा लेकर युवतियाँ दो दलों में विभाजित हो कर आमने-सामने खड़ी होती हैं और बीच में एक पुरुष ढोल बजता है, एक महिला दो पंक्ति गाती है और शेष महिलाएं उसे दोहराते हुए नृत्य करती हैं|
पश्चात् बैगा जनजाति के करमा नृत्य की प्रस्तुति हुई, इस नृत्य को भादों माह की एकादशी की उपवास करके करम वृक्ष की शाखा को आंगन या चौगान में रोपित किया जाता है। दूसरे दिन नये अन्न को अपने कुल देवता को अर्पित करने के बाद नवामनका उपयोग प्रारंभ किया जाता है। नई फसल आने की खुशी में करम पूजा में हर किसी का मन मयूर नृत्य करने लगता है। नृत्य का मूल आधार नर्तकों का अंग संचालन होता है।


ठाठया नृत्य- ठाठ्या कोरकू जनजाति की उप जाति है, जो मूलतः कोरकुओं के ग्वाले हैं। ठाल्या समूह द्वारा दीपावली के अवसर पर विशेष रूप से ठाठ्या नृत्य किया जाता है। ढोलक की थाप पर भुगडू (बांसुरी) की मधुर धुन नृत्य को धीमी गति से द्रुत की ओर ले जाती है। भैंस के सींग से निर्मित सिंगी की ध्वनि से नृत्य का प्रारंभ किया जाता है।
प्रस्तुति का समापन बुन्देलखण्ड अंचल के बरेदी लोकनृत्य से हुआ- बरेदी लोकनृत्य का सम्बन्ध हमारे देश की कृषक चरवाहा संस्कृति के साथ है। बरेदी नृत्य दीपावली से पन्द्रह दिन अर्थात पूर्णिमा तक चलते हैं। अत्यन्त आकर्षक नृत्य पोषाक के साथ आठ दस युवक और किशोर नर्तक अत्यंत तीव्र गति के साथ नृत्य करते हैं एक व्यक्ति नृत्य के पहिले गीत गाता है। प्रायः दो पंक्तियों की लोक कविता जिसे बुन्देली में दिवारीय कहा जाता है। दीपावली के अवसर पर की जाने वाली गोवर्धन पूजा से इसका घनिष्ठ संबंध है।

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