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क्या मजबूर किए गए ज्योतिरादित्य….

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पढिये वरिष्ठ पत्रकार दिनेश निगम त्यागी का विश्लेषण….उनकी फेसबुक बाल से

  • ज्योतिरादित्य सिंधिया के पार्टी छोड़ने पर कयासों का दौर जारी है। उन्होंने ऐसा करना पहले से तय कर रखा था या इसके लिए वे मजबूर हुए। जानकार दूसरी बात को ज्यादा तवज्जो देते हैं। कांग्रेस को चंबल-ग्वालियर अंचल में कांग्रेस को सबसे ज्यादा सफलता इसलिए मिली, क्योंकि लोगों को उम्मीद थी, चुनाव बाद सिंधिया मुख्यमंत्री बनेंगे। वे मुख्यमंत्री नहीं बने। पाटी हाईकमान के निर्णय को शिरोधार्य कर उन्होंने कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनने दिया। अब जवाबदारी कमलनाथ की थी। उन्हें सिंधिया को संतुष्ट करना था। नाथ चाहते तो सरकार गठित होते ही सिंधिया को कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनवाते। सिंधिया और उनके समर्थक इसकी मांग लगातार कर रहे थे। पर ऐसा नहीं हुआ। इधर सिंधिया किसी न किसी तरह अपनी नाराजगी व्यक्त करते रहे। उन्होंने अतिथि विद्वानों व शिक्षकों के लिए सड़क पर उतरने की बात कही तो मुख्यमंत्री ने कह दिया ‘तो उतर जाएं’। नाथ को ऐसा नहीं बोलना था। यह ‘जले में नमक छिड़कने’ जैसा था। पार्टी ने सिंधिया का नाम राज्यसभा के लिए घोषित करने में भी विलंब किया। मैसेज गया, सिंधिया के राज्यसभा जाने की राह में भी रोड़े अटकाए जा रहे हैं। कमलनाथ मुख्यमंत्री हैं और दिग्विजय सिंह सरकार चला रहे हैं। सिंधिया को किनारे किया जा रहा है। ऐसे में यही लगता है कि सिंधिया ने पार्टी छोड़ी नहीं, उन्हें बाहर जाने के लिए मजबूर किया गया। कमलनाथ एवं दिग्विजय ने उन्हें नाराज होने दिया और यह आंकने में विफल रहे कि सिंधिया पार्टी छोड़ने जैसा कदम भी उठा सकते हैं। नतीजा सरकार पर संकट है।
  • अब भी ‘फिफ्टी-फिफ्टी’

    के हालात….
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  • ज्योतिरादित्य के भाजपा ज्वाइन करने और समर्थक 22 विधायकों के बेंगलुरु में डेरा डालकर इस्तीफा भेजने के बाद से कमलनाथ सरकार को संकट में और कुछ दिन का मेहमान माना जा रहा है। विशेषज्ञ इस राय से इत्तफाक नहीं रखते। उनके अनुसार अब भी फिफ्टी-फिफ्टी के हालात हैं। दोनों पक्षों के कान्फिडेंस को देखकर ऐसा लगता है। राज्यपाल द्वारा फ्लोर टेस्ट के निर्देश देने के बावजूद मुख्यमंत्री कमलनाथ, दिग्विजय सिंह सहित सरकार के सभी प्रबंधक दावा कर रहे हैं कि सरकार बहुमत में है। वह फ्लोर टेस्ट में पास होंगे। दूसरी तरफ भाजपा नेताओं का कहना है, इस्तीफों के बाद सरकार अल्पमत में है। बजट सत्र से पहले फ्लोर टेस्ट होता है या नहीं, यह सोमवार को तय होगा लेकिन राज्यपाल ने भाजपा की बात मानकर निर्देश जारी कर दिए। फिर भी दोनों तरफ भरोसा भी है और डर भी। डर के हालात न होते तो बागियों सहित विधायक प्रदेश से बाहर न भेजे जाते। दरअसल, दोनों दलों को अपने विधायकों के टूटने का खतरा है। कांग्रेस नेता कहते हैं कि जिन बागियों को बाहर रखा गया है, उनमें से अधिकांश कांग्रेस के साथ हैं। मुख्यमंत्री कमलनाथ राज्यपाल और केंद्रीय गृह मंत्री को पत्र लिखकर केंद्रीय सुरक्षा के साथ बागी विधायकों को वापस प्रदेश भेजने की मांग कर रहे हैं। भाजपा की मांग पर फ्लोर टेस्ट तय हो गया। कांग्रेस विधायक भोपाल आ गए लेकिन बागी व भाजपा विधायक कब आएंगे तय नहीं है। अर्थात दानों पक्ष हार मानने को तैयार नहीं हैं। इसलिए कहा जा रहा है कि सरकार को लेकर ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है।
  • भाजपा को महंगा न पड़ जाए निर्णय….

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  • कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा ज्वाइन करने के बाद से अटकलें तेज हैं। फायदा में कौन रहेगा, भाजपा या ज्योतिरादित्य। यह कहने वाले ज्यादा हैं कि निर्णय भाजपा के कई प्रमुख नेताओं को महंगा साबित पड़ सकता है। जयभान सिंह पवैया, प्रभात झा जैसे नेता सिंधिया की खिलाफत के अगुवा रहे हैं। पवैया के साथ रुस्मत सिंह, लाल सिंह आर्य सहित कई नेता सिंधिया समर्थकों से विधानसभा का चुनाव हारे हैं। बागी विधायकों के भाजपा में आने के बाद इनका फिर टिकट पक्का है। ऐसे में पवैया, लाल सिंह व रुस्तम सिंह जैसे नेता क्या करेंगे। दूसरा, शिवराज सिंह चौहान तक सिंधिया खानदान को अंग्रेजों से मिला हुआ और गद्दार कहते रहे हैं। इनके सुर अब बदल गए हैं। फिर भी जोश में सिंधिया को विभीषण बोलकर उन्होंने अपनी मंशा जता दी है। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण भाजपा ज्वाइन करने के बाद सिंधिया का पहला भोपाल दौरा हुआ। वे भाजपा कार्यालय गए और शिवराज-नरोत्तम के घर खाना खाया। केंद्रीय मंत्री नरेद्र सिंह तोमर भी साथ रहे। हर जगह सिंधिया ही हीरो थे। नारे सिर्फ उनके समर्थन में लगे। भाजपा के किसी नेता या पार्टी के समर्थन में नहीं। हालात ये थे कि सभी नेता सिंधिया के पिछलग्गू दिखाई पड़े। ज्योतिरादित्य का आभामंडल ही ऐसा है। इसलिए सिंधिया की भाजपा में इंट्री खुद उनके लिए फायदेमंद है लेकिन भाजपा नेताओं के लिए महंगी साबित हो सकती है।
  • पराजय का डर कांग्रेस के लिए संजीवनी….

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  • कमलनाथ सरकार का अस्तित्व बागी विधायकों के रुख पर टिका है। इनमें 10 से ज्यादा पहली बार विधायक बने हैं। कांग्रेस की उम्मीद का आधार है, उप चुनाव में पराजय का डर। विधायकों को मालूम है, जीत के लिए क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं। कितना पैसा खर्च होता है। अभी सरकार में ठीक से जम भी नहीं पाए और विधायकी पर खतरा आ गया। चुनाव का अपना खर्च तक नहीं वसूल सके। यदि विधायकी गई तो फिर जीतेंगे या नहीं, गारंटी नहीं। उन्हें अहसास है कि कांग्रेसियों का समर्थन उन्हें मिलेगा नहीं और भाजपा के जिन नेताओं का टिकट कटेगा वे भितरघात करने से नहीं चूकेंगे। ऐसे में खतरा ही खतरा है। लिहाजा, कई विधायकों का मन डांवाडोल हो सकता है। इस आधार पर ही कांग्रेस नेता कह रहे हैं कि अधिकांश विधायक उनके संपर्क में हैं। उन्हें सामने आने दीजिए वे कांग्रेस के साथ होंगे। सिंधिया के कट्टर समर्थक रहे पूर्व मंत्री रामनिवास रावत ने भी कांग्रेस में रहने की घोषणा करते हुए कहा कि उनकी लगभग एक दर्जन बागी विधायकों से बात हुई है। वे बेंगलुरु में भोपाल आने के लिए फड़फड़ा रहे हैं। विधायकों को मनाने के लिए कांग्रेस उनके परिजनों की मदद भी ले रही है। भरोसा दिलाया जा रहा है कि उप चुनाव में आपके जीत की गारंटी नहीं है लेकिन हम अभी मंत्री बनाने तैयार हैं। साफ है उप चुनाव में हार का डर कांग्रेस सरकार के लिए संजीवनी का काम कर सकता है।
    0 भाजपा-कांग्रेस में शह-मात का खेल….
  • सियासी घमासान के बीच कांग्रेस-भाजपा में शह-मात का खेल तेज है। कांग्रेस के 22 बागी विधायकों ने इस्तीफे दिए थे लेकिन स्पीकर ने सिर्फ 6 के स्वीकार किए। स्पीकर एनपी प्रजापति का कहना है कि ये सभी मंत्री थे। इन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त किया जा चुका है। इन्हें दो दिन अपनी बात रखने का अवसर दिया गया लेकिन ये नहीं आए। इसलिए इनका इस्तीफा स्वीकार किया जाता है। भाजपा ने स्पीकर के निर्णय पर सवाल उठाए हैं। नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव का कहना है कि जब 22 ने इस्तीफे दिए थे तो सिर्फ 6 के क्यों स्वीकार किए। इससे स्पीकर की नीयत पर संदेह होता है। इधर सरकार गिराने-बचाने को लेकर भाजपा-कांग्रेस में जोड़तोड़ जारी है। विधि एवं संविधान विशेषज्ञों से राय-मशविरा किया जा रहा है। राज्यपाल लालजी टंडन द्वारा फ्लोर टेस्ट के निर्देश देने के बाद इसमें तेजी आई है। भाजपा की कोशिश है कि बागी विधायकों में से एक भी कांग्रेस के पास वापस न लौटे। इसलिए उन्हें सुरक्षित स्थान पर रखा गया है। किसी से मिलने नहीं दिया जा रहा। भाजपा के विधायक व नेता उनके साथ हैं। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी उनके संपर्क में है। दूसरी तरफ अपने विधायकों को मनाने की हर चाल कांग्रेस चल रही है। डराने व लालच देने का अभियान जारी है। शह-मात का यह खेल कुछ दिन और खिंचने की संभावना है। संभव है राज्यपाल के निर्देश पर फ्लोर टेस्ट ही न हो। इस बारे में पत्ते नहीं खुले हैं। इसलिए मामला कोर्ट की दहलीज तक जाने से इंकार नहीं किया जा सकता।

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