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राष्ट्रनायक कौन- अकबर या महाराणा प्रताप? - Aaj Ki Chitthi : पढ़ें हिंदी न्यूज़, Latest and Breaking News in Hindi, हिन्दी समाचार, न्यूज़ इन हिंदी

राष्ट्रनायक कौन- अकबर या महाराणा प्रताप?

राजस्थान के बच्चों को पढ़ाया जा सकता है कि हल्दी घाटी की लड़ाई में राजपूत शासक महाराणा प्रताप ने मुगल बादशाह अकबर को मात दी थी. बाकी भारत के लिए हल्दी घाटी की लड़ाई के विजेता अकबर ही हैं.

राजस्थान यूनिवर्सिटी ने एक बीजेपी विधायक के उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है जिसमें उन्होंने कहा था कि यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रमों यह लिखा जाए कि हल्दी घाटी का युद्ध अकबर से महाराणा प्रताप हारे नहीं थे.

अभी हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि इतिहासकारों ने महाराणा प्रताप के साथ नाइंसाफ़ी की है. उन्होंने कहा था कि अकबर को द ग्रेट कहा जाता है लेकिन महाराणा प्रताप को महान क्यों नहीं कहा जाता है. राजनाथ सिंह ने कहा था कि महाराणा प्रताप राष्ट्रनायक थे.

‘अकबर या महाराणाः महान तो एक ही था’

ब्लॉ़ग: अकबर के ज़माने में प्राइवेट टीवी चैनल होते तो?

जब प्रताप के सामने अकबर को चने चबाने पड़े

अक़बर बाहरी आक्रांता थे?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कहा कि अकबर आक्रांता था और असली हीरो महाराणा प्रताप हैं. योगी ने कहा युवा जितनी जल्दी इस सच को स्वीकार कर लेंगे उतनी जल्दी देश को सारी समस्याओं से छुटकारा मिल जाएगा.

क्या हमारी सरकारें इतिहास को अपने हिसाब से तोड़-मरोड़कर लिखवा रही हैं? क्या अक़बर आक्रांता थे? क्या महाराणा प्रताप अकबर से ज़्यादा महान थे? क्या हल्दी घाटी में अकबर की हार हुई थी? क्या अकबर और महाराणा प्रताप का संघर्ष हिंदुओं और मुसलमानों का संघर्ष था?

इन सारे सवालों पर बीबीसी संवाददाता रजनीश कुमार ने देश के जाने-माने इतिहासकार हरबंस मुखिया से बात की है. हरबंस मुखिया मध्यकालीन इतिहास के ज्ञाता हैं. वह जेएनयू में इतिहास के प्रोफ़ेसर थे. पढ़िए उन्हीं के शब्दों में सारे सवालों के जवाब-

आज की तारीख़ में इनकी ज़रूरत यही है कि वो अपने मन का इतिहास पढ़ाएं. मतलब राजस्थान में उनको ऐसी ज़रूरत थी तो कर दिया. आने वाले दिनों में देश अन्य हिस्सों में भी ऐसा देखने को मिल सकता है. इतिहास को यहां हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है.

इतिहास के तथ्यों से इन्हें कोई मतलब नहीं है. इनकी राजनीतिक ज़रूरतें झूठ से पूरी होती है तो वो झूठ को ही सच कहेंगे. ऐतिहासिक तथ्य तो यही है कि हल्दी घाटी में महाराणा प्रताप हारे थे. इस हार के बाद वो अपने चेतक घोड़े के साथ निकल गए थे. हल्दी घाटी के बाद उन्होंने बड़ी मुश्किल से जीवन व्यतीत किया. उन्होंने काफ़ी मुश्किलें झेली थीं लेकिन यह सच है कि वह अकबर से हल्दी घाटी की लड़ाई हारे थे.

मैं हल्दी घाटी जा चुका हूँ. मेरा उस मैदान को देखने का मन था जिसमें इतना प्रसिद्ध युद्ध हुआ था. मैं जानना चाहता था कि कितना बड़ा मैदान है. वो छोटा सा मैदान है. मेरा ख्याल है कि तीन या चार फुटबॉल मैदान के बराबर का वह मैदान है. ज़ाहिर सी बात है कि उसमें हज़ारों और लाखों की तादाद में सिपाही नहीं आ सकते हैं.

मतलब वहां पर बहुत बड़ी लड़ाई नहीं हुई थी. दूसरी बात यह है कि महाराणा प्रताप लगभग अकेले राजपूत शासक थे जिन्होंने अकबर के सामने समर्पण नहीं किया. इस लड़ाई का कोई विशेष ऐतिहासिक महत्व नहीं था. 16वीं, 17वीं और 18वीं सदी में इस बात का महत्व न इस तरफ़ से था, न उस तरफ़ से था.

हालांकि लोकप्रिय कल्पनाओं में महाराणा प्रताप को एक हीरो की तरह से देखा गया. और देखा जाना भी चाहिए था क्योंकि वो अकेले राजपूत थे जिन्होंने घुटने नहीं टेके और आख़िरी दम तक लड़ते रहे. एक हीरो की तरह उनको याद किया गया. हम सभी जानते हैं कि नायकों को लेकर सबकी अपनी-अपनी यादें होती हैं.

दिक़्क़त यहां है कि महाराणा प्रताप को जो पोशाक पहनाई जा रही है कि उन्होंने भारत की सुरक्षा में विदेशियों से टक्कर ली और वो एक राष्ट्रीय हीरो थे, जिसने राष्ट्र की गरिमा के लिए लड़ाइयां लड़ीं, ये सच नहीं है. देश की कल्पना न केवल भारत में बल्कि संसार भर में 18वीं और 19वीं शताब्दी में आई है.

अंग्रेज़ी में देश को कंट्री कहते हैं लेकिन कंट्री क्या देश को कहा जाता था? कंट्री तो गांव को कहा जाता है. जो लंदन में बड़े-बड़े लोग रहते हैं उनके लिए कंट्री हाउस होता है. कंट्री का मतलब देश नहीं है. यह केवल अंग्रेज़ी में ही नहीं बल्कि फ्रेंच में भी ऐसा ही है. फ्रेंच में पेई कंट्री को कहते हैं और पेंजा किसान को कहते हैं.

देश का मतलब हमारे यहां भी गांव हैं इसीलिए हम कहते हैं कि परदेस जा रहे हैं. आप पटना से कोलकाता चले गए तो परदेस चले गए. परदेस को लेकर कितनी कविताएं और लोककथाएं मौजूद हैं. देश का मतलब होता है कि जहां आप पैदा हुए हैं. देश और उसके बरक्स जो विदेश की परिकल्पना है ये 18वीं और 19वीं सदी की है. 16वीं सदी में देश, विदेश और विदेशी जैसी परिकल्पना कहीं नहीं थी. और राष्ट्र का तो बिल्कुल सवाल ही नहीं था.

ये सारी परिकल्पाएं बाद की हैं और इनका अपना महत्व है. समस्या तब होती है जब आप जब 19वीं सदी की परिकल्पना को 16वीं सदी में बैठा दें तो वैसे ही होगा जैसे हम मान लें कि हल्दी घाटी की लड़ाई में अकबर की फ़ौजें फाइटर प्लेन में बैठकर गई थीं. कोई ऐसा करने की ज़िद करे तो हम इसे बेवकूफी ही कहेंगे.

लेकिन उनको इस बेवकूफी से फ़ायदा हो रहा है और ये बेवकूफी उनकी ज़रूरत है. बीजेपी की वोट बैंक की राजनीति का राजस्थान बेहतरीन उदाहरण है. इतिहास को तोड़-मरोड़ कर लिखवाना केवल राइट विंग को ही रास नहीं आता है, बल्कि सोवियत रूस में ऐसा काम कम्युनिस्टों ने भी किया था.

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